प्यार की टकरार

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इश्क में धोखा मिले या प्यार ये तो अपने अपने किस्मत की बात है | इस कम्बख्त इश्क ने अनगिनत लोगो को बर्बाद किया  है | रोज़ बर्बादी के  नए नए किस्से सुनते है फिर भी प्यार करना  नहीं छोड़ते | आखिर क्यों ? कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे प्यार से प्यारी दुनिया में कोई चीज नहीं तो कभी यह  सब एक झूठ ,छलावा  मालूम पड़ता है | यह प्यार  हीं है जो जानवर को इंसान बनता है और ये ही वक्त आने पर उसे हैवान बना देता है | तो कुल मिलकर नुक्सान हीं हुआ ना ,जानवर से हैवान बन गए | प्रकाश पार्क के बेंच पर बैठा यही सब सोच रहा था |अपने प्यार के सफ़र के हर एक पड़ाव को याद करके मंथन में लगा हुआ था |सौम्या जिसे वो आंठवी कक्षा से प्यार करता था ऐसा करेगी उसने सपने में भी नहीं सोचा था |उससे जुड़ी छोटी से छोटी  याद आँखों से बड़ी बड़ी बूंदों को नीचे  घास पर धकेले  जा  रही थी |
 
उसके प्यार की  शुरुआत तब हुई जब वो सत्य निकेतन के आठवी कक्षा में पड़ता था |हॉस्टल के कमरे में इसके साथ विपुल रहता था | वो पांचवी कक्षा में पड़ता था | विपुल के माता पिता अक्सर उसे मिलने आया करते थे |वे बड़े अछे लोग थे ,हर बार प्रकाश के लिए कुछ ना कुछ ज़रूर लाते |एक रविवार की बात है ,प्रकाश बदन सिकोड़े, चादर लपेटे सोया हुआ था | इतनी देर  तक कोई सोता है भला | एक मीठी सी आवाज़ आई | प्रकाश सपना देख रहा था ,उसे लगा कोई लड़की उसे सपने में जगा रही  है | एक दो बार पुकारने के बाद भी  कोई हलचल न हुई देख कर  लड़की ने चादर जोर से खिंचा | प्रकाश हड़बड़ा कर उठा | सामने एक सुन्दर सी लड़की खड़ी थी |उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अब भी वो सपना देख रहा है या सही में कोई उसके सामने खड़ा है | घूरता रहा | आखिरकार लड़की ने चुप्पी तोड़ी  "मुझे माफ़ कर दीजिये "| मुझे लगा की विपुल है | मैं उसकी बड़ी बहन हूँ |
प्रकाश अभी भी हतप्रभ था |समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहे फिर भी खुद को संभालता हुआ बोला "कोई बात नहीं ,बल्कि अच्छा हुआ आपने जगा दिया |मैं तो विल्कुल आलसी हो गया हूँ | विपुल खेलने गया होगा  |बैठिये मैं उसे बुला कर लाता हूँ | यह कहते हुए प्रकाश विपुल को ढूढ़ने निकल गया | कुछ देर में लौट कर बोला ,वो तो मिल नहीं रहा है | आप यही इंतज़ार कीजिये थोड़ी देर में आ जाएगा |कमरे में सन्नाटा छा गया |एक एक पल घंटो के समान मालूम पड़ने लगे  |दोनों सर निचे किये हुए बैठे हुए थे | बीच बीच में  एक दुसरे को देखने  की कोशिश करते और कभी नज़रे टकराते हीं शर्म से  पलके नीची कर लेते |
      
उस रात जब प्रकाश सोने गया तो आँखों में नींद नहीं |उसी ध्यान लगा हुआ था |अफ़सोस करता ,काश कुछ बाँतें कर लेता | जाने कब फिर किसी लड़की से बात करने का मौका मिले |कम से कम नाम  तो पूछ हीं लेता | वो बेसब्री से अगले रविवार का इंतज़ार करने लगा कि शायद वो फिर आये | ऐसा हुआ भी पर उस दिन विपुल कमरे में मौजूद था सो बात के नाम केवल औपचारिकता हीं हुई | प्यार की चिंगारी किसी दीया-बाती की  मोहताज़ नहीं ,नाहीं उसे शोला बनने के लिए घी तेल की आवश्यकता पड़ती है |वो तो कभी भी ,कही भी भड़क सकती है | रूप नारी का सबसे बड़ा श्रृंगार होता है और सोम्या में इसकी कोई कमी नहीं थी | उसके एक हीं मुस्कान से ऐसी चिंगारी भड़की कि प्रकाश दिन रात उसकी जलन में तड़पने लगा | आग के करतब दिखाने वाले भी अक्सर उसी आग से जल जाते हैं | सोम्या भी कहाँ बचने वाली थी | दो चार मुलाकातों में हीं ये शोला सोम्या को भी जलाने लगा |  पहले  तो वो पगली सकुचाई फिर उसे एहसास हुआ कि अगर कोई निहारने वाला हीं ना  हो तो ये रूप ,ये श्रृंगार किस काम का | जिस तरह कोई भवरा किसी सुंदर कली के चारो ओर चक्कर काटता रहता है उसी प्रकार प्रकाश  की  भी दुनिया सोम्या तक सिमित हो गई  | उसकी हर बात सोम्य से शुरू होती और सोम्या पर हीं ख़त्म होती |   वे छुप छुप के मिलते | खूब सारीं बातें होतीं | साथ जीने  मरने की कसमें खायी जातीं |फिल्मों के डायलेक्ट चुरा-चुरा के सुनाये जाते | उनका प्यार ,प्यार कम बचपना ज्यादा मालूम पड़ता था | लेकिन समय के साथ उनमें परिपक्वता आ गई | तीन साल बीत गए | सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अचानक विपुल ने दोनों को साथ देख लिया |एक झटके में हीं सब समझ गया | घरवालों को सारी खबर दे दी |
सौम्या  के पिताजी आग बबूला हो गए | उसका घर से निकलना बंद कर दिया |उन्होंने सौम्या को कसम खिलाई कि वह प्रकाश से अब कभी नहीं मिलेगी |जब प्यार सर चढ़ के बोलता है तो कुछ नहीं सूझता | प्यार के नाम पर किया गया हर काम  सही लगता है |उस काम को इश्वर के पूजा से तुलना की जाती है |सौम्या की भक्ति कम नहीं हुई  पर उसका प्रकाश से मिलना पहले से ज़रूर कम हो गया | जहाँ वो पहले सप्ताह  में २-३ मिल लेती थी ,वहीँ २-३ सप्ताह में एक-आध  बार मिलने लगी |बारहवीं पास करते हीं प्रकाश का चयन  दिल्ली के एक मशहूर मेडिकल कॉलेज में हो गया |उसका मन तो बिलकुल नहीं था कि वर्धमान छोड़ कर दिल्ली जाए पर क्या  करता कैरिरार का सवाल था ,सो जाना पड़ा | उधर सौम्या का दाखिला वर्धमान के हीं एक कॉमर्स कॉलेज में हो गया |
 
दोनों को दिन अब सूना-सूना मालूम पड़ता | रात को झींगुर विरह गीत जाते सुनाई पड़ते |फोन पर चाहे जितनी बाँतें हो जाए पर वो नज़रों का टकराना ,शर्म से कपोलो का लाल हो जाना ,वो अदाएं ,वो इठलाना सब जाता रहा |  प्रकाश अकसर ये गीत "हो कर मजबूर उसने बुलाया होगा " सुनता रहता | वो जानता था कि सौम्या तो शहर से बाहर जा नहीं सकती सो वो ही दो तीन महीने पर उससे मिलने वर्धमान चला जाता | वक्त इंसान को हर हाल में रहना सिखा हीं देता है | समय के साथ इन्होने भी एक तरह से समझौता कर लिया | मिलने की तड़प कम हो गई सो  प्रकाश का वर्धमान जाना भी कम हो गया | हाँ पर फोन पे  बाँतें होतीं रहती | वह हमेशा सौम्या से आग्रह करता रहता "सौम्या कभो तो दिल्ली आओ |"करीब दो साल बाद उसकी मुराद पूरी हुई | सौम्या ने ट्रेनिंग की झूठी कहानी बना कर अपने पिता को मना लिया | उसने कहा कि दिल्ली में अपने सखी के साथ गिर्ल्स हॉस्टल में ठहरेगी |
    
ट्रेन से उतरते हीं वो प्रकाश के बांहों में कुछ इस तरह समा गई जैसे कोई चंचल नदी रेगिस्तान में समा जाती है | वो उसे सीधे अपने कमरे पर ले आया |पिताजी को यकीन दिलाने के लिए सौम्या ने  प्रकाश के हीं कॉलेज के किसी लड़की का नंबर दे दिया और कह दिया को वो उसके साथ रह रही है |फिर से वही पुराने सुख के दिन लौट आये थे | प्रकाश ने कॉलेज जाना बंद कर दिया | दिन भर उससे बाँतें करना ,उसके जुल्फों से खेलना ,उसे घुमाने ले जाना |उसका अब बस यही काम रह गया था | उसने सौम्या को दिल्ली की हर घुमने वाली जगह दिखाई ,दोस्तों से उधार लेकर खूब सारी खरीददारी कराई | अब दिन ज्यादा उज्जवल और रातें और भी गहरी  नज़र आती | एक रोज़ दिन सही में बहुत उज्जवल था | बहुत तेज धूप के बावजूद दोनों लाल किला घुमने गए | शाम को  कमरे पर लौटते लौटते  गर्मी से हालत खराब हो गई सो आज वो जल्दी सो गयी  | प्रकाश अभी तक जाग रहा था | यह रात बाकी रातों से अलग थी | सौम्या के केश बिखरे पड़े थे | कपड़ो में सिलवटे पड़ गयीं थीं | उसके अलसाए  यौवन का उभार प्रकाश पर रह रह के प्रहार कर रहा था | वो लाख नज़रें हठाने की कोशिश करता  पर कुछ हीं पलों में आँखे वही टिक जाती |पहली बार उसने सौम्या को  ऐसे  देखा था | पहली बार उसने इतने करीब से महसूस किया कि अब वह बच्ची नहीं रही | बंद कली सुंदर फूलों का आकार  ले चुकी थी | वो काम-ज्वर से तपने लगा | 
वह बार बार उसके तरफ बढ़ता और पास जाते हीं वापस आ जाता | इस अंतर्द्वंद से निकल पाना  उसके लिए इतना आसान नहीं  | कभी उसे लगता कि ये सब गलत है,पाप है तो कभी सही ,बल्कि उसका अधिकार है और ये अधिकार सौम्या ने हीं उसे दिया है | न रात ख़त्म हो रही थी न उसे  नींद हीं आ रही थी | बत्ती बुझा कर अगर सोने की कोशिश भी करता तो कुछ हीं देर में फिर उठकर  निहारने लगता | किसी तरह रात कटी | अगले दिन प्रकाश सौम्या से नज़रें नहीं मिला पा रहा था | अचानक प्रकाश के व्यवहार में आये बदलाव को सौम्या समझ नहीं पा  रही  थी  | वह जब भी उससे इस बारे में पूछती ,वो टाल जाता | सौम्या भी कम नहीं थी ,उसने खाना-पीना छोड़ दिया | आखिरकार मजबूर होकर प्रकाश ने रात की सारी घटना कह  सुनाई |
सौम्या -  छिः कैसी गन्दी बातें करते हो |तुम्हे तनिक भी शर्म नहीं आती क्या ? प्रकाश - "इसमें गलत क्या है ? हम इतने दिनों से एक दुसरे को चाहते है ,साथ जीने मरने की कसमें खाते है तो फिर ये संकोच क्यों ?" सौम्या - "मान मर्यादा भी कोई चीज़ होती है | यह सब हमारें संस्कृति के खिलाफ है |न बाबा न ,शादी से पहले यह सब कुछ नहीं |"  प्रकाश - "तो ठीक है शादी कर लेते है |"  सौम्या - "शादी कोई  मजाक है जो एक क्षण में लिए फैसले से कर लिया जाए " |
 
इस बात को लेकर रोज़ दोनों में  जम के बहस होती | प्रकाश कई बार बहुत हीं ज्यादा  उग्र हो जाता | प्रकाश जिसे सौम्या के प्यार ने इंसान बनाया था आज वही प्यार उसे हैवान बनने पर मजबूर कर रहा था | एक दिन प्रकाश इतना गुस्सा हो गया कि जैसे सौम्या को
मार हीं बैठेगा | सौम्या डर गई ,बोली अब मैं एक पल नहीं रुकुंगी यहाँ | मुझे तो अब तुमसे डर लगने लगा गई | तुम हैवान बन गए हो | प्रकाश - "यह तुम क्या कह रही हो !,मैंने सारी दुनिया से केवल तुम्हारी खातिर दुश्मनी मोल लिए बैठा हूँ और तुम्हे मुझसे डर लग रहा है ? प्रकाश ने बहुत मनाया, समझाया, सैकड़ो बार माफ़ी मांगी पर वो नहीं मानी ,रोते रोते अपना सामान  बंधने लगी |  प्रकाश- "पर तुम जाओगी कहाँ ? तुम तो कह के आई थी ट्रेनिंग ३ सप्ताह की है | अभी तो बस १५ दिन हीं हुए है |"दिल्ली में हीं मेरी एक दोस्त रहती है ,उसी के पास चली जाउंगी |" जब वो कमरे से सामन लेकर निकले लगी तो प्रकाश ने उसका हाथ पकड़ लिया | सौम्या उसे नाख़ून से चीरती हुई निकल गई | जाते हुए एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा | ये कहावत है कि इन्सान को कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए पर जिंदगी में कभी कभी ऐसे हालत बन जाते है जब उसे पीछे मुड़कर देखना पड़ता है | आज इसकी बेहद जरुरत थी पर सौम्या ने ऐसा नहीं किया | प्रकाश भक सा दरवाजे पर खड़ा उसे जाते हुए निहारता रह गया | 
 
 
   
By Nishikant Tiwari
Comments (4)
  • Raman
    Quote:
    I to has a very similar experience.I was foolish really.I hope she could forgive me that.When I read this story again the sudued pain of romance has become hard . :no-comments:
  • jatin  - pyar
    pyar,,ye koi mjak ni @ na hi koi khel hai..bas ye to man ki man se lagan hai.duniya ki kisi book me ye ni likha pyar krna galt hai par agar pyar maryada me rhe ,,aise haivan banna galt hai..is havaniyat ko pyar ni pyas kehte hai
  • manish bansal  - love is love
    well hi to all...i think ki soumya sahi hai yahan par...par ek baat ye bhi hai ki prakash ke man me jo khayal aaya wo kisi ke man me bhi aa sakta hai or is baare me somya ko naraj nahi hona chahiye tha agar unme itni samjh hoti to sayad jo prakash ke saath huwa wo nahi hota...isme jhagda karne jaisi koi baat nahi thi...ise baat se solve kiya ja sakta tha or gharwalo se shadi ki baat ki ja sakti thi ..ya shadi ka promiss karke apni stdy puri karke dono ki shadi ho sakti thi...!!!! thats it
  • karam
    i m totly agree with paraksh,
    she should forgive to him.
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